मत्ती 7: 7 (एएमपीसी) – मांगते रहो और तुम्हे दिया जाएगा; ढूंढ़ते रहो और तुम पाओगे; खटखटाते [सम्मान पूर्वक] रहो और तुम्हारे लिए [द्वार] खोला जायेगा । जो माँगता रहता है, उसे दिया जाता है ; और वह जो ढूंढता रहता है, उसे प्राप्त होता है; और जो खटखटाता रहता है उसके लिए [द्वार] खोला जाता है।
हमने इस वचन को कई बार पढ़ा होगा, लेकिन यहाँ कुंजी यह है कि आप मांगते रहो, ढूंढ़ते रहो और खटखटाते रहो ,रुकें नहीं, यह ना सोचें कि परमेश्वर को जानने के लिए एक आरामदायक स्थान पर जाने की आवश्यकता है। एक विश्वाशी के रूप में निरंतर उसकी खोज में लगे रहना ही उसको जानने का सबसे सही स्थान है। अकसर हम यिर्मयाह 29:11 पढ़ते हैं और वहीं रुक जाते है, लेकिन यह सिर्फ़ शुरुआत है। पद 12 और 13 भी महत्वपूर्ण हैं। परमेश्वर यह नहीं कहते हैं कि आप मुझे “ढूंढ” सकते हैं, लेकिन आप ढूंढेंगे। कैसे? जब आप उसे आधा-अधूरा चाहते हैं? नहीं ! जब आप उसे पूरे ह्रदय से चाहते है। यह आपकी लालसा है जो स्वर्ग का ध्यान आपकी ओर आकर्षित करती है और आपको आपके ह्रदय के केंद्र से जोड़ती है, जो कि यीशु है। जब हम यीशु के लिए अपने ह्रदय में जोश भरते हैं और उसे अपने ह्रदय और मन से जानने की खोज में रहते हैं ठीक उसी तरह जिस तरह से वह स्वयं को प्रकट करना चाहता है ,तो हम उसे देखेंग। “यूहन्ना 14: 21-जिस के पास मेरी आज्ञा है, और वह उन्हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है, और जो मुझ से प्रेम रखता है, उस से मेरा पिता प्रेम रखेगा, और मैं उस से प्रेम रखूंगा, और अपने आप को उस पर प्रगट करूंगा।”
परमेश्वर को देखने के लिए न पुकारें, परमेश्वर के लिए परमेश्वर को पुकारें। लालसा स्वर्ग को आकर्षित करती है। लालसा अप्रतिष्ठित है। हम जक्कई की कहानी जानते हैं । जिस क्षण उसने यीशु के बारे में सुना, वह उसे देखने के लिए इतना इच्छुक हो गया कि वह एक पेड़ पर चढ़ गया! क्या आप सोच सकते हैं, उस शहर के सबसे धनी लोगों में से एक होने के बावजूद, वह एक पेड़ पर चढ़ गया? उसने यह नहीं सोचा कि लोग उसके बारे में क्या सोच सकते हैं। उसके ह्रदय में इच्छा थी और वह यीशु को देखने के लिए कुछ भी कर सकता था। लेकिन जो हम मांगते हैं , सोचते हैं, या कल्पना करते हैं, परमेश्वर हमेशा हमें उससे अधिक प्रतिफल देते हैं। लालसा ने अंधे बरतिमाई को यह प्रार्थना करने पर उकसाया कि “यीशु, दाऊद की संतान , मुझ पर दया कर”। लोगों ने उसे यीशु नासरी, परमपिता परमेश्वर का पुत्र कहा, लेकिन किसी ने उसे दाऊद का पुत्र नहीं कहा! लालसा हमेशा दैविक प्रकाशन जारी करती है। यह उसकी लालसा ही थी जिसने उसे यीशु के बुलाए जाने पर अपना चोग़ा फेंकने की अनुमति दी। उसने कहा कि “मैं इसे कभी अब दोबारा नहीं पहनूंगा”। लालसा ने मरियम मगदलीनी को यीशु से ,इससे पहले कि वह पिता के पास लौट सके,सामना करने की अनुमति दी। यह उसकी लालसा ही थी जिसके कारण यीशु उसके सामने आया (यूहन्ना 20: 10-18)।
2 कुरिन्थियों 4: 16-18 इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है। और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं।
हम यह कैसे कर सकते हैं? जो देखा नहीं जा सकता वह मैं कैसे देख सकता हूँ? विश्वास ही के द्वारा ! कुलुस्सियों 3: 1-2 हमें अपना ह्रदय और मन स्वर्गीय वस्तुओं पर लगाने को कहता है। आपका ध्यान वहीँ आकर्षित होगा जहाँ आपका ह्रदय होगा। आपको “मैं बेचारा” औऱ “मैं ही क्यों” वाले दृष्टिकोण से ऊपर उठना होगा जिसमे हम परमेश्वर से यही पूछते रहते है कि “मैं ही क्यों” औऱ कभी कभी अपने मन में सोचते हैं कि मुझे कभी कोई दैविक अनुभव नहीं होगा। नहीं ! आपको अपना दृष्टिकोण स्वर्ग कि और करना होगा। आप साधारण नहीं है। आपकी मंजिल कि गहराई बहुत ज्यादा है। यही कारण है कि आप अभी भी जीवित हैं और इसे पढ़ रहे हैं। क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि आप उसे जानें कि आप उसके लिए विशेष हैं। और परमेश्वर को जानने के रोमांच का एक हिस्सा उसका चेहरा देखना और उसकी महिमा का सामना करना है। प्रिय दोस्तों, उन्होंने हमारी पीढ़ी के लिए यह विशेषाधिकार रखा। उसने हमारे लिए अंत में सबसे उत्तम बचाकर रखा। लेकिन क्या हम अब भी उसको पाने के लिए भूखे हैं? क्या हम अभी भी उसे चाह रहे हैं? उसका वचन कहता है कि जब यीशु को गहराई से जानने के लिए हमारा ह्रदय एक नए जोश के साथ जलता है, तो वह आएगा और हम उसे देखेंगे। हमारे पास स्वर्ग का ऐसा सामना करने का सुअवसर है जैसा पहले कभी ना हुआ हो। मत्ती 5:28 का अर्थ है कि यीशु हमारी कल्पना को गंभीरता से लेते हैं। विश्वास इसे सक्रिय करता है। लेकिन यह तब शुरू होता है जब हम अपनी कल्पना को स्वर्ग के राज्य की खोज में शामिल करते हैं। जब आप प्रार्थना करते हैं तो यीशु को अपने सामने देखें, क्योंकि दाऊद कहता है कि मैंने प्रभु को हमेशा अपने सामने रखा है। उसे हमेशा अपने साथ और सामने देखें। जब आप ऐसा करना शुरू करते हैं, तो हार न मानें और रुकें नहीं। इसमें कुछ समय लग सकता है लेकिन आपकी दृढ़ता ही आपकी सफलता है। परमेश्वर के साथ घनिष्टता ही कुंजी है। यह जानते हुए कि परमेश्वर को आपसे कितना प्रेम है ,जब आप उसे अपने ह्रदय और मन और कल्पनाओं में उससे प्रेम करते हैं, सब कुछ बदल जाता है। परमेश्वर एक पवित्र कल्पना के माध्यम से बोलते हैं। आप ध्यान देंगे कि थोड़ी देर बाद परमेश्वर आपकी कल्पना के माध्यम से आपसे बात करना शुरू कर देंगे लेकिन यह अभ्यास से शुरू होता है। उसे घनिष्ट रूप से जानने की और वह क्या कर रहा है यह जानने की इच्छा रखें। मत्ती 17 में पतरस , याकूब और यहुन्ना इस दायरे में देख सकते थे। वे सब कुछ देख सकते थे। कैसे? क्योंकि वे यीशु के साथ थे। हमारी देखने की क्षमता सक्रिय है और घनिष्टता के साथ बढ़ती है। सिर्फ यीशु को देखना ही नहीं बल्कि यीशु खुद ही हमारे लिए एक जूनून होना चाहिए।
उसको निरंतर खोजने से हम एक विजयी स्थिति में प्रवेश करते हैं। उसको खोजने कि इच्छा रखने से हम अपने आप में जो बदलाव देखना चाहते हैं वो भी देखेंगे। प्रिय दोस्तों, यही वास्तविकता है। पवित्र आत्मा से मांगें कि वह आपके अंदर यीशु के लिए एक नया जूनून , उसको घनिष्ट रूप से जानने की इच्छा और उसको आपके आमने सामने देखने के लिए मदद करे। परमेश्वर आप सभी को आशीष दे।
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