हाल ही में, स्वर्गदूतों के एक मुठभेड़ के दौरान मैंने महसूस किया कि प्रभु कहते हैं, “थामे रह”। अब जिज्ञासु लोगो के मन में यह सवाल हो सकता है कि “उसने परमेश्वर को कैसे सुना”, “वह क्या कर रहा था। रुकिए, मैं इसको सरल बना देता हूँ। ईमानदारी से कहु तो मैं बस सुबह वचन पढ़ रहा था और पढ़ते समय मैं बस चुप हो गया और बाट जोहने लगा। जब मैं बाट जोह रहा था, मैंने मुठभेड़ के लिए बिल्कुल कोई इच्छा या भूख नहीं रखी और कुछ ही समय में अचानक मैंने अपनी बाईं आंख में से लाइट की एक फ्लैश देखी (स्वर्दूतों कि गतिविधि) और मैंने तुरंत अपना ध्यान अपने विचारो पर किया। तभी मेरे मैं में विचार आया, “थामे रह”। जैसे ही मैंने यह सुना, मैंने सोचा कि “ओह नहीं, और क्या होने जा रहा है कि प्रभु मुझसे यह कह रहा है कि थामे रह”। और फिर मैंने खुद से कहा, “अरे अरे, रिलैक्स, डर मत”। आपने ध्यान दिया, विश्वास परमेश्वर के वचन को सुनने से आता है और दुष्ट इस विश्वास के साथ डर को मिला रहा था। जब मुझे यह एहसास हुआ, मैं शांत हो गया। मैं जान गया कि प्रभु ने जब कहा “थामे रह”, तो प्रभु मुझे प्रोत्साहित कर रहे थे।
मैं आपको कुछ उदाहरण देता हूँ। कुछ समय पहले, एक निश्चित शहर में एक न्यायाधीश था जो न तो परमेश्वर से डरता था और न ही इस बात की परवाह करता था कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं। एक विधवा थी, जो उनसे विनती करती रही, “हे महान न्यायाधीश, कृपया मुझे मेरे विरोधी के खिलाफ न्याय प्रदान करें”। कुछ समय के लिए जज ने इनकार कर दिया लेकिन बाद में उसने सोचा, “भले ही मैं परमेश्वर से न डरता और न ही परवाह करता कि लोग क्या सोचते हैं, यह विधवा मुझे बार-बार परेशान करती है। मैं देखूंगा कि उसे न्याय मिलेगा ताकि उसे फिर से आकर मुझको परेशान न करना पड़े ”(लुका 18:1-8)। तो यहाँ प्रमुख बात यह है कि भले ही न्यायाधीश के पास “मैं परवाह नहीं करता” मानसिकता थी, विधवा को वह मिला जो वह दृढ़ता के साथ चाहती थी और हार नहीं मान रही थी। और इसके तुरंत बाद, यीशु ने एक गंभीर बात कही, “लेकिन जब मनुष्य का पुत्र आएगा, तो क्या वह पृथ्वी पर विश्वास पाएगा”?
अब्राहम भी आपके और मेरे जैसा कोई था। परमेश्वर ने उससे कहा, “आकाश को देख, सितारों की संख्या गिन- उतने तेरे संतान होंगे”। इससे पहले परमेश्वर ने उसका नाम “कई राष्ट्रों के पिता” कर दिया। अच्छा, अब्राहम के तब कितने बच्चे थे? एक भी नहीं! लेकिन अगर आप रोमियों 4:18-21 पढ़ते हैं, तो आपको आश्चर्य होगा कि अब्राहम किस तरह का आदमी था? यह कैसा विश्वास था उसका कि उसने इस बात को नज़रअंदाज़ किया कि उसका शरीर 100 साल की उम्र में मर चुका था और सारा का गर्भ भी उस उम्र में मर चुका था। यह कैसा विश्वास था उसका कि परमेश्वर के वायदों के प्रति वो अविश्वास को लिए डगमगाया नहीं वरन यह लिखा है वचन में कि, “वह विश्वास में दृढ़ हुआ और परमेश्वर को महिमा दी”। क्या? आपने यह सुना? तो बात यह नहीं कि उसका विश्वास “कैसा” था लेकिन उसका विश्वास “कहाँ” था। अब्राहम जानता था कि विश्वास कि नीव अनदेखी वस्तुओं में होनी चाहिए। अक्सर हम हताश हो जाते हैं क्योंकि हमारे बाहरी अवस्थाएं हमारे अंदरूनी अंगीकार से मेल नहीं खाते और हम आशा खोना शुरू कर देते हैं, बहुत जल्दी। फिर हमने अब्राहम के उदाहरण से क्या सीखा? वह बाहरी अवस्था से नहीं हिला और परमेश्वर ने जो कहा था उसे कसकर थाम लिया। इन दिनों अपने विश्वास को मेरे प्रियो दृढ़ करें। हमारे देश में जो कुछ चल रहा है, उसके बीच में अपने विश्वास को दृढ़ करें।
जब मनुष्य का पुत्र आएगा, तो क्या वह विश्वास पाएगा? या मुझे इस तरह से यह प्रश्न पूछना चाहिए। परमेश्वर का पुत्र पहले से ही आप के भीतर है। जब वह आपके ह्रदय में झांकता है, तो क्या वह विश्वास या डर को पाता है? आशा या निराशा? भरोसा या शंका? मैं प्रार्थना करता हूँ कि वह आप में विश्वास, आशा और भरोसे को देखे।
इसलिए जब प्रभु कह रहा है कि “थामे रह”, मेरा मानना है कि हमें अपने विश्वास को थामे रहना चाहिए, परमेश्वर के वायदों को थामे रहना चाहिए, और सबसे महत्वपूर्ण बात, परमेश्वर की शांति को थामे रहना चाहिए। वह शांति का राजकुमार हैं। इसलिए अपने भीतर उसकी उपस्थिति का एहसास करें और उसकी शांति को अपने भीतर ग्रहण करें और धन्यवाद के साथ उसे वातावरण में रिलीज़ करें। वह हमारा बल और हमारा गढ़ है। थामे रहना।
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