क्या आपने कभी यह सवाल किया है कि हे परमेश्वर क्या आप जानते हैं कि मैं आपसे प्रेम करता हूं? क्योंकि हम उसे बताते तो रहते हैं लेकिन हम उससे कभी नहीं पूछते कि क्या वह इसे जानता है, है ना? मेरे मन में भी एक बार यह सवाल था और मैंने एक दिन निश्चय किया कि मैं स्वयं परमेश्वर से पूछूंगा। मैंने कहा, “परमेश्वर क्या आप जानते हैं कि मैं आपसे प्यार करता हूँ”? अब देखो उसने क्या कहा! उन्होंने कहा, “हां और मैं तुमसे प्रसन्न हूं। तुम्हारी भावनाएं, तुम्हारा जज़्बा और नाराजगी मुझको जागरूक करती है। मैं तुम्हारा आदर करता हूँ स्टेनली। तुमने मेरे दिल को मोह लिया है”। ओह, उसकी प्रतिक्रिया हमेशा मुझे विवश कर देती है। क्या आप उसके और मेरे दिल को देख सकते हैं? वह हमसे बिना शर्त के प्रेम करता है। वह आपसे प्यार करता है और आपको बाकी सब बातों से अधिक बहमूल्य जानता है।
यह मुझको और एक अनुभव की याद दिलाता है जिसे मैं आज के ब्लॉग में बाटना चाहता हूँ। परमेश्वर के साथ कई मुठभेड़ों के एक समय के बाद मेरे जीवन में एक ऐसा समय आया जब मैं बाट जोहता था और ठहरता था उसकी उपस्थिति में और कुछ भी नहीं सुनता था, कुछ भी महसूस नहीं करता था। न कोई मुठभेड़ न कोई आवाज, कुछ भी नहीं। इसने मुझे निराश कर दिया। मैं आपको याद दिला दूं कि इससे पहले मैंने प्रभु से विभिन्न तरीकों से मुठभेड़ प्राप्त किये थे। मैं इतना हताश हो गया कि मैं प्रभु को ताकता रहा और उनसे सवाल करता रहा कि ऐसा क्यों हो रहा है। “क्या उसने मुझे छोड़ दिया है” और “क्या मैंने उसे दुःखी या निराश किया” इन सवालों ने मुझे परेशान किया। तब मुझे नहीं पता था कि परमेश्वर मेरे चरित्र पर काम कर रहे थे। वह मुझे अपने वचन पर नीव डाले रहना सिखा रहे थे न कि अपने अनुभवों पर । इन जैसे मौसमों में सीखने के लिए बहुत कुछ है और अब इन जैसे कई मौसमों से गुजरने के बाद मुझे लगता है कि अब मैं इसके बारे में काफी कुछ कह सकता हूँ। लेकिन अब मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि हार मत मानो। प्रभु को आपके भीतर काम करने की अनुमति दें। ये वही दिन हैं जिन्हें मैं ‘सूखा मौसम’ (मेरी निजी राय) कहूंगा। लेकिन इस मौसम को कभी कम मत समझो क्योंकि फिर से ये हमारे जीवन के सबसे फलदायी मौसमों में से एक हैं। यहीं पर हमारा चरित्र बनता है। हमारे विश्वास परखा जाता है और हमारी दृढ़ता की परीक्षा होती है। यह हमारी कमजोरियों को उजागर करने के लिए नहीं है बल्कि हमें हर स्थिति में बने रहने के लिए सशक्त बनाने के लिए है । इन दिनों में से एक के दौरान मुझे याद है कि मैं प्रभु की उपस्थिति में ठहरा था और उसके साथ मुठभेड़ करने के लिए इतना बेताब था क्योंकि उसे इतना लंबा समय हो गया था। मैं सिर्फ इसके बारे में सकारात्मक होकर खुद को सांत्वना दे रहा था। मैं कहता रहा, “स्टेनली, अब पवित्र आत्मा की सामर्थ को तू अनुभव करेगा”। लगभग एक घंटे के बाद बस ऐसा लगा की मैं अपने बिस्तर पर बेकार बैठा हूँ। मुझे बेवकूफी लगने लगी। इसके बाद मैं इतना थक गया और निराश हो गया कि मैं हार मानने के कगार पर था। मैं कहने वाला था, “ओह यह सब किसी काम का नहीं है”, और अचानक, मैंने सुना, “तु ने मेरे दिल को मोह लिया है” (श्रेष्टगीत 4:9)। ओह! मुझे अपनी पहली प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से याद है। मैंने कहा, “मैं”? “मैंने परमेश्वर”? मैंने कहा, “प्रभु मैंने नहीं तू ने, तू …. सिर्फ तूने तूने तूने” … और मैं एक बच्चे की तरह रोने लगा। यह एक ऐसा सामर्थी पल था जब मैंने उसका हमारे प्रति प्रेम का एहसास किया और वह कितनी धैर्य से हमें देखता है। वह कितनी बारीकी से हमारे साथ चलता है, और जब मैंने सोचा कि बस बहुत हुआ और मैं छोड़ देना चाहता हूं वह वहां था और वो आया। परमेश्वर की महिमा हो।
इसलिए मैं सिर्फ आप सभी को इस ब्लॉग के साथ प्रोत्साहित करना चाहता था। अरे याद रखना, हार मत मानना। साँस लो, रिलैक्स करो। परमेश्वर तुम्हारे लिए है, वह तुम्हारी और है।
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